आर्थिक रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों की मानें तो पश्चिमी यूपी के कई जिलों में प्रति व्यक्ति आय 1.5 लाख से 2.5 लाख रुपये वार्षिक के बीच पहुंच चुकी है, जबकि पूर्वांचल के अनेक जिलों में यह औसतन 45 हजार से 80 हजार रुपये वार्षिक के आसपास ही सीमित है।
- पूर्वांचल-पश्चिम यूपी विकास की असमानता कब तक?
वाराणसी : उत्तर प्रदेश में विकास की तस्वीर दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है। एक तरफ पश्चिमी यूपी का गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ और नयी दिल्ली से जुड़ा औद्योगिक बेल्ट है, जहां एक्सप्रेसवे, आईटी पार्क, मेट्रो, बड़े उद्योग और ऊंची प्रति व्यक्ति आय देखने को मिलती है। वहीं दूसरी ओर गाजीपुर, बलिया, चंदौली, सोनभद्र और अन्य पूर्वांचली जिलों में आज भी रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्योगों की भारी कमी बनी हुई है। कोरोना काल में पूर्वांचल के लोगों की भयावह तस्वीरें भी सामने आ चुकी है. किस तरह यहां के युवाओं का पलायन होता है, उन्हें मुम्बई और गुजरात में कैसे जलालत झेलनी पड़ती है.
आर्थिक रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों की मानें तो पश्चिमी यूपी के कई जिलों में प्रति व्यक्ति आय 1.5 लाख से 2.5 लाख रुपये वार्षिक के बीच पहुंच चुकी है, जबकि पूर्वांचल के अनेक जिलों में यह औसतन 45 हजार से 80 हजार रुपये वार्षिक के आसपास ही सीमित है। यही कारण है कि पूर्वांचल से बड़े पैमाने पर पलायन जारी है।
पूर्वांचल राज्य जनांदोलन पार्टी के कार्यकारी संयोजक हरवंश पटेल ने कहा कि “ गाजियाबाद और गाजीपुर" की तुलना करना ही पूर्वांचल के साथ दशकों से हुए असंतुलित विकास की सबसे बड़ी सच्चाई है। जब तक पूर्वांचल को अलग राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक यहां के युवाओं, किसानों और मजदूरों को न्याय नहीं मिल पाएगा।”
उन्होंने मांग की कि पूर्वांचल में उद्योग, मेडिकल कॉलेज, आईटी हब, कृषि आधारित फैक्ट्रियां और विशेष आर्थिक पैकेज लागू किए जाएं, ताकि क्षेत्रीय असमानता को समाप्त किया जा सके.

