मुगलसराय के गुलमर्ग होटल में 'जागरण समूह' द्वारा इवेंट में करीब 15-16 लोगों को यह सम्मान मिला जिसमें दुर्गेश सिंह भरी सभा में सर्वोच्च नजरों से सम्मानित नजर आए।
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| दुर्गेश सिंह को " शिरोमणि सम्मान " से सम्मानित करते हुए डीएम चंद्र मोहन गर्ग ,बांयें सीडीओ चंदौली |
- बोले - भिक्षाटन ही मिशन है —हर मुस्कान की वजह बनना मेरा सपना
- इवेंट में बुद्धिजीवी वर्ग दांतों तले उंगली दबाने पर हुए मजबूर
- दुर्गेश सिंह के बेमिसाल निर्णय पर लोगों में जताया आश्चर्य
- मुगलसराय के गुलमर्ग होटल में "जागरण समूह " ने आयोजित किया कार्यक्रम
- जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग तथा मुख्य विकास अधिकारी भी रहे मौजूद
चंदौली। मुगलसराय के गुलमर्ग होटल में जागरण समूह द्वारा इवेंट में करीब 15 16 लोगों को यह सम्मान मिला जिसमें दुर्गेश सिंह भरी सभा में सर्वोच्च नजरों से सम्मानित नजर आए। शिरोमणि सम्मान मिलने पर लोगों द्वारा आश्चर्य करने लगे। चंदौली जिला अधिकारी तथा मुख्य विकास अधिकारी के सामने लोग
आपस में कहने लगे इतना खूबसूरत चेहरा इतना बढ़िया बॉडी,कम उम्र,इस व्यक्ति के अंदर गरीब वर्ग के लिए सेवा करने का जज्बा यह दिखाता है कि यह व्यक्ति साधारण व्यक्ति नहीं है समाज में गरीब लड़कियों की शादी कराना,गरीब बच्चों को कापी किताब बांटना, उन गरीब लड़कियों को जो दूरदराज से आती है, साइकिल प्रदान कराना इनका मिशन है।
ये अपने मिशन में किसी प्रकार की कोई कोताही नहीं करते। वह हमेशा घर से बाहर ही घूमते रहते हैं। घूम कर शिक्षा में योगदान देने के लिए भिक्षाटन करते हैं ऐसी शख्सियत को इवेंट ने चुनकर चंदौली जिला की जनता को गौरवान्वित करने का काम किया है।
दुर्गेश सिंह ने स्वयं बताया की मैं इसे एक मिशन के रूप में ले लिया हूं अब मेरे जीवन में इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है मुझे दो प्रदेशों के राज्यपालों ने सम्मानित किया है जनपद चंदौली के बेसिक शिक्षा अधिकारी ने मुझे सम्मानित किया है.
समाजसेवा करना ही मेरा उद्देश्य बन चुका है : दुर्गेश सिंह (आवाज़ापुर)
उत्तर प्रदेश के जनपद चंदौली के छोटे से ग्राम आवाज़ापुर की पावन मिट्टी में जन्मे दुर्गेश सिंह का जीवन त्याग, सेवा और समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। 14 जनवरी 1983 को जन्मे दुर्गेश सिंह ने साधारण जीवन जीने के बजाय एक असाधारण राह चुनी—ऐसी राह, जिस पर चलने के लिए केवल साहस ही नहीं, बल्कि एक विशाल और करुणामय हृदय की आवश्यकता होती है।
जब अधिकांश लोग अपने जीवन को संवारने में लगे रहते हैं, तब उन्होंने दूसरों के जीवन में उजाला भरने का संकल्प लिया और वर्ष 2014 में भिक्षाटन जैसी अनोखी पहल शुरू की; परंतु यह भिक्षाटन उनके अपने लिए नहीं, बल्कि उन गरीब, असहाय और वंचित बच्चों, विशेषकर बेटियों के लिए था, जिनके सपने अभावों में दम तोड़ देते हैं।
वे गाँव-गाँव, शहर-शहर जाकर रेलवे स्टेशनों, बाजारों, चौक-चौराहों, दुकानदारों, यात्रियों, किसानों, मजदूरों से लेकर समाज के सक्षम वर्ग तक सभी से सहयोग लेते रहे; उनकी झोली में गिरा हर एक अंश किसी जरूरतमंद के जीवन में आशा की किरण बनता गया। प्रारंभ में समाज ने उनका उपहास भी किया—“महात्मा गांधी का नया चेला पैदा हो गया है”, परंतु सच्ची निष्ठा और निस्वार्थ सेवा के आगे यह उपहास अधिक समय तक टिक नहीं सका और धीरे-धीरे उनका प्रयास एक जनआंदोलन का रूप लेने लगा।
इसके परिणामस्वरूप उन्होंने अब तक लगभग 200 से अधिक बालिकाओं को साइकिल उपलब्ध कराकर शिक्षा से जोड़ा, 100 से अधिक बच्चों का विद्यालयों में प्रवेश कराया, 11 जरूरतमंद बेटियों के विवाह संपन्न कराए तथा 12 बार रक्तदान कर मानवता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
उनका कार्य केवल सहायता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनपद के आदिवासी बाहुल्य नौगढ़ क्षेत्र में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने का माध्यम भी बना। समय-समय पर समाज के विभिन्न वर्गों, जागरूक नागरिकों एवं प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा भी उनके इस पुनीत कार्य में सहयोग और प्रोत्साहन मिलता रहा, जिसने उनके हौसले को और मजबूत किया।
इन्हीं सतत प्रयासों और निस्वार्थ सेवा भाव ने यह सिद्ध कर दिया कि दुर्गेश सिंह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं—एक ऐसा जीवंत उदाहरण, जो यह सिखाता है कि यदि संकल्प सच्चा हो, तो सीमित साधनों के बावजूद भी समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। उनका जीवन हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणास्रोत है, जो समाज के लिए कुछ करना चाहता है, और आज आवश्यकता है कि हम सभी उनके इस अभियान में सहभागी बनकर उनके हौसले को और बुलंद करें, ताकि सेवा की यह ज्योति निरंतर प्रज्वलित रहती रहे।



